( मेरा गाँव)
गीत पिक के, काक के काँव – काँव
बट वृक्ष के छाँव,
सरसों के पीत पुलकित पुष्प
सरिता में विहसित नाव।
खेतों में बैलों की जोड़ी
मुस्काते खेत – खलिहान,
चारो पहर हो व्याकुल
खड़े स्वागत को सिवान।
नागपंचमी के दंगल – कुश्ती
दशहरा के वे मेले,
कठघोड़े, चरखा – चरखी
लट्टू – जलेबी – केले।
प्रातः का शीघ्र जागना
शाम की मस्त थकान,
निशा के कोमल बाहों में
रंगीन सपनों के उड़ान।
पटनी पर पड़े गुड़ – खटाई
कोठली के वे धान,
होली का फाग – जोगिरा
महुवे के रसपान।
थक चुका है मन का परिंदा
ढूंढ़ – ढूंढ़कर हर ठाँव ,
भग्न शहरों में सिमट चुका है
सुंदर – सा मेरा गाँव।
……… दिलीप कुमार चौहान “बागी”
