मत हो मनुज अधीर
वरक-तूलिका के संघर्ष से उपजी,
कविता है मेरा नाम।
दिनकर की खर किरण हूँ मैं,
सरसिज की मंद मुस्कान।
नूपुर की कांत ध्वनि हूँ,
मुरली की मधुर तान।
लाने आई हूँ शिथिल काया में,
पुनः थिरकन, पुनः जान।
पर्वत की ऊँचाई हूँ मैं,
सागर की गहराई हूँ।
मिटाने आई हूँ रातों की स्याही,
भोर की अरुण लाली हूँ।
सरिता का सतत प्रवाह हूँ,
सचल-शीतल समीर।
मरहम बनकर आई हूँ,
मत हो मनुज अधीर।
- डॉ. दिलीप कुमार चौहान “बागी”

