आ हाथ को पकड़ ले, मैँ गिर कहीं न जाऊंँ।
इस भीड़ के शहर में, मैं रंग कृष्ण पाऊंँ।।
कलुषित हृदय हमारा, तुझको नहीं बसाए।
रिश्ता बना जगत से, मुझको बड़ा सताए।।
काबिल बना मुझे इस, उर में तुझे बसाऊँ।।
इस भीड़ के शहर में, मैं रंग कृष्ण पाऊंँ।।
तम से भरे नयन से, मिलता नहीं किनारा।
नइया भँवर फंँसी है,आ दे उसे सहारा।।
पतवार का सदा मैं, रहबर तुझे बनाऊँ।
इस भीड़ के शहर में, मैं रंग कृष्ण पाऊंँ।।
है जिंदगी न अपनी, इसका नहीं ठिकाना।
छल से भरे जगत में, बस्ती नहीं बसाना।
चाहूंँ यही विधाता, तुझ संग घर बसाऊंँ।
इस भीड़ के शहर में, मैं रंग कृष्ण पाऊंँ।।
हर मोड़ हर गली पर, हर दिल भरा कपट है।
कैसे करे गुजारा, ये भक्त तो निपट है।।
संबंध फिर बता मैं, कैसे यहां निभाऊंँ।
इस भीड़ के शहर में, मैं रंग कृष्ण पाऊंँ।।
दिखता सभी जगह पर, छल झूठ बोलबाला।
गोरे रखे बदन पर, अंतस् न है उजाला।।
दिल दर्द मैं उन्हीं से, कैसे भला बताऊंँ
इस भीड़ के शहर में, मैं रंग कृष्ण पाऊंँ।।
कांँटे भरे डगर पर, मुझसे चला न जाए।
मन ढूंँढ तो रहा है, पर लक्ष्य को न पाए।।
जिस राह पर मिले तू, सपने वही सजाऊँ।।
इस भीड़ के शहर में, मैं संग कृष्ण पाऊंँ।।
अर्चना आनंद गाजीपुर उत्तर प्रदेश
