मैं भी सूरज बनके जीना चाहता हूँ
हर अँधेरा जग का पीना चाहता हूँ
शह्र देखे हैं बहुत तेरे करम से
अब तो बस जाना मदीना चाहता हूँ
मैॅने जी भर-भर के गंगा जल पिया है
आबे-ज़मज़म अब मैं पीना चाहता हूँ
हैं मेरे आदर्श सरहद के सिपाही
मय शहादत की मैं पीना चाहता हूँ
ज़ख़्म हो चाहे किसी के जिस्म पर भी
सूई धागा बनके सीना चाहता हूँ
जिसपे नाज़ाँ हो क़यामत तक ज़माना
ज़िन्दगी का वो क़रीना चाहता हूँ
पार जो फ़िक्रों के दरिया से लगाए
ऐसा अब ‘हिमकर’ सफ़ीना चाहता हूँ
रोमित हिमकर, बस्ती, उत्तर प्रदेश
