—-शराब और शराबी —-
एक बार शराब को लेकर
शराबियों में बहस छिड़ गई
सभी एक दूसरे पर
आरोप – प्रत्यारोप लगाने लगे
अपनी – अपनी डफली
अपना – अपना राग अलापने लगे
तभी मौके को भाँपते हुए
स्थिति को सम्हालते हुए
एक शराबी ने
अपनी बुद्धि को टटोला
और बोला —
” भाई ! यह वक्त
लड़ने – झगड़ने का नहीं है
बैठकर सोचने – समझने का है
क्योंकि दिन पर दिन
शराब और शराबियों की
स्थिति दयनीय होती जा रही है
आए दिन सरकार
हम दोनों पर
पाबन्दी लगाती जा रही है
अगर यही हाल रहा
और यही चाल रहा
तो वह दिन दूर नहीं
जब संसार से
शराब और शराबियों का
नामों – निशाँ मिट जाएगा
हम दोनों का सुखद भविष्य
अंधकार में खो जाएगा “
इस बात को ,
गंभीरता से लेते हुए
एक दूसरा शराबी बोला–
“भाई ! तुने क्या बतलाई
तेरी बात अब समझ में आई
आखिर हमारी ही
आँखों के सामने
हमारी जाति का विनाश हो रहा है
हमारे पेय पदार्थ का
नाश हो रहा है
इतना ही नहीं
हमारी ईज्जत का भी
ह्रास हो रहा है
और हम लोग
हाथ पर हाथ धरे बैठें हैं
सचमुच
चुपचाप खामोश बैठे हैं
इसका कारण कोई और नहीं
बस ,एक ही है
न तो हमारा कोई नेता है
और नहीं कोई यूनियन है
जो हमारी बात
सड़क से लेकर संसद तक उठाए
शराब और शराबियों के
बारे में बताए
कि , हम दोनों की उपेक्षा करके
कोई भी समाज
तरक्की नहीं कर सकता
क्योंकि हमने ही दुनिया को
नया आयाम दिया है
भाईचारा, प्रेम और
एकता का पैगाम दिया है
हमारे यहाँ
मंदिर – मस्जिद का झगड़ा नहीं
छुआछूत का लफड़ा नहीं
भेदभाव का रगड़ा नहीं
हमने जातिवाद को तोड़ा है
वंशवाद को मोड़ा है
क्षेत्रवाद को छोड़ा है
इतना ही नहीं
अपनी पत्नी को भी माँ कहते हैं
गधे-कुत्ते को भी बाप कहते हैं
फिर हमसे टकराए कोई
किसी की औकात क्या ?
मुखौटा ओढ़े
सभ्य समाज की बिसात क्या?”
काश!हमारा समाज
शराब और शराबियों से
कुछ सीख पाता।।
– डी.एन.सिंह ‘रसिक’
बलिया (उत्तरप्रदेश)
